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कांग्रेस की यही मुश्किल

रास्ता संभवत: यही है कि राहुल गांधी जनता के बीच जाकर पार्टी की प्रासंगिकता को फिर से जीवित करने के प्रयास में जुटे रहें। इसमें उन्हें सीमित सफलता भी मिली, तो पुरानी संस्कृति के नेता खुद ही अप्रासंगिक हो जाएंगे।

राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो पदयात्रा से जन मानस में जो सकारात्मक अहसास पैदा किया है, उस पर अशोक गहलोत और उनके समर्थकों ने घड़ों पानी डाल दिया है। अगर बारीकी से देखें, तो इस घटनाक्रम से कांग्रेस का बुनियादी मसला साफ होकर उभरता है। राहुल गांधी के बयानों और उनकी गतिविधियों पर गौर करें, तो संकेत मिलता है कि संभवत: 2019 के आम चुनाव के समय ही उन्होंने इस मसले को समझ लिया था। मसला यह है कि भारतीय राज्य-व्यवस्था पर आरएसएस-भाजपा के बने वर्चस्व को वे जिसे वैचारिक नजरिए से देखतें हैं, कांग्रेस में शायद ही कोई ऐसा करने को तैयार है। इसलिए कि पार्टी कुल मिला कर अपना स्वार्थ साधने के लिए इक_ा नेताओं का एक झुंड बनी हुई है। ये नेता पुराने दौर की जोड़-तोड़ और किसी तरह सत्ता पा लेने की तिकड़मों में अपने को ज्यादा सहज पाते हैं।

वरना, किसी पार्टी में अध्यक्ष से बड़ा पद और बड़ी जिम्मेदारी और क्या हो सकती है? लेकिन गहलोत ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि इस पद से उन्हें गुरेज नहीं है, लेकिन लेकिन मुख्यमंत्री पद छोडऩे की कीमत पर वे इसे नहीं लेना चाहेंगे।  2019 में पार्टी अध्यक्ष छोड़ते वक्त राहुल गांधी ने कहा था कि जब वे आम चुनाव में देश और पार्टी के नजरिए से जीवन-मरण की जंग में जुटे थे, तब पार्टी के बड़े नेता अपने परिजनों को टिकट दिलवाने और उनकी सीटों तक चुनाव प्रचार में खुद सीमित  रखने के मोह से नहीं उबर पाए। जाहिर है, बीते तीन साल में पार्टी की इस संस्कृति में कुछ नही बदला है। बहरहाल, इसके बीच रास्ता संभवत: यही है कि राहुल गांधी जनता के बीच जाकर पार्टी के विचार और प्रासंगिकता को फिर से जीवित करने के प्रयास में जुटे रहें। अगर इसमें उन्हें सीमित सफलता भी मिली, तो कांग्रेस का एक नया रूप उभर सकेगा, जिसमें पुरानी संस्कृति के नेता खुद ही अप्रासंगिक हो जाएंगे।

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